इन तीन शब्दों पर यदि ध्यान दें तो विकास का विशेषण हुवा "प्रकृति केंद्रित" | इसलिए सबसे पहले विकास यानी क्या ? यही स्पष्ट होना जरूरी हो गया है | जैसे आदमी है तो वजन बढ़ना, तब जबकि आदमी दुबला हो और कुछ मोटा हो जाये | लेकिन ज्यादा मोटा हो जाये तो ? यदि किसी को हांथी पांव हो जाय, फाइलेरिया हो जाय तो उसका बड़ा विकास हो गया .....ऐसा तो कोई नहीं कहेगा ? इसलिए विकास के सम्बन्ध में, जैसा वह स्वभाव में स्थित है अपने भाव में स्थित, "स्वस्थ" | मतलब स्वयं में स्थित रहे, तब तो स्वस्थ होगा | लेकिन यदि ऐसा न हो तो उसे कैसे विकास कहेंगे ? जब हम विकास की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय देश से और देशों से होता है | विकास शब्द से हमारा ताल्लुक कुछ राष्ट्रीय, सामाजिक, मानवीय विकास से होगा | अब तक विकास के मापक शब्दों के रूप में हमने कई शब्द सुन रखे हैं | जैसे पर कैपिटा इनकम, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स, गरीबी रेखा आदि आदि | हमने ये शब्द दशकों से सुने हैं और सरकारों को इन्ही आधारों पर अब तक काम करते, चलते हुए देख रहे हैं | इन शब्दों को तथाकथित विकसित देशों ने अपने अनुरूप विकसित किया और प्रसारित प्रचारित किया |
विकास शील देशों ने इन्ही के आधार पर बिना कुछ सोचे, कि उनके देश के क्या पैमाने हैं, ....स्वीकार कर लिया | परिणाम ये रहा कि विकसित दिखने की राह में चलते हुए भुखमरी, बेरोजगारी, हिंसा, लूट, अपहरण, बलात्कार फिर हथियारवाद और सरकारवाद ....इस रूप में नया विकास सामने आ गया | विकास यानी सुविधा प्राप्त करना और जीवन उसी सुविधा को बढ़ाते हुए बिता देना, समाप्त कर देना, ऐसी मनोदशा विकसित कर दी गयी |
फिर सत्ता से पैसा और पैसों से सत्ता प्राप्ति भी इसी बात का परिणाम है | जैसे जैसे विकास बढ़ा वैसे वैसे महारोग भी बढ़ गए | पैसे वाला और अधिक पैसा प्राप्ति की तरफ बढ़ा तो गरीब और अधिक गरीब होते गए | पूरा विश्व खरीदो और बेंचो ...इसी मानसिकता में बढ़ता चला गया है | तब समझ में आता है कि केवल शरीर को स्वस्थ रखने और केवल शरीर के सुख के लिए सुविधा बढ़ाने से ही काम नहीं चलेगा | क्योंकि शरीर और मन का रिश्ता है | और शरीर सिर्फ शरीर ही नहीं बल्कि मन, बुद्दि और आत्मा का समुच्चय है | इसीलिए मनुष्य खुशी, दुःख और तकलीफ के भाव भी व्यक्त करता है | ज्यादा समझने पर ये भी बात समझ आती है की शरीर यदि स्वस्थ है तो श्रम की आवश्यकता है | अस्वस्थ व्यक्ति को भी व्यायाम की सलाह ही दी जाती है ताकि जल्दी स्वस्थ हो | यदि श्रम नहीं रहा तो रोग बढ़ेंगे | यदि परिश्रम का उचित फल नहीं मिला तो भी समस्या खड़ी होगी | ऐसे में हम जितना मनुष्यत्व और प्रकृति के करीब होकर जिएंगे उतना ही सही ढंग का जीवन स्तर पा सकेंगे | इसलिए समत्व में जीवन जीना ही मनुष्यता है | फिर विकास के कई पहलू हैं | जैसे यदि सिर्फ खाने को, पहनने को मिल गया तो क्या विकास हो गया ? फिर बाकी चीजें भी तो चाहिए | शिक्षा, संस्कार, और अपनी चाहतों को पूरा करने के भी तो मौके चाहिए | इसलिए विकास का दूसरा पहलू भी है | विकास का अर्थ केवल भौतिक समृद्धि नहीं हो सकता | समृद्धि के साथ साथ यदि आतंरिक विकास नहीं हुए तो उसे विकास नहीं कहा जा सकता | विकास के साथ साथ हमें अपने जीवन में भी समाधान चाहिए | इसलिए सुख की परिभाषा सिर्फ शारीरिक नहीं हो सकती | ऐसे ही स्थिति समाज और देशों की भी होती है | जिसे हम आतंरिक विकास कहते हैं | उसे ही सामान्य शब्दों में संस्कृति कहा जाता है | तो बाहरी विकास का अर्थ है ‘समृद्धि’ और आतंरिक विकास का अर्थ है ‘संस्कृति’ |
अब ये बातें सच हैं तो फिर 'समृद्धि' यानी 'भौतिक' और 'संस्कृति' यानी 'प्रकृति से ऊंचा' होना है | एक उदाहरण से हमें समझना होगा कि खाना खा लेना प्रकृति है | छीन कर खाना विकृति है, लेकिन बाँट कर खाना ही संस्कृति है | जब कहा जाता है कि भारत की अपनी संस्कृति है, सभ्यता है तो वहां इन्ही अर्थों में हमें अपनी पह्चान को समझना होगा | यही सनातन संस्कृति भारत के वेद, और समस्त ऋषी मुनियों ने हमें प्रदान की है | इसी के आगे हम "वसुधैव कुटुम्बकम" की बात समझ सकते हैं | इसी आधार पर भारतीय समाज कि स्थापना है | इन्ही आधारों पर धर्म, अर्थ कि रचना हुई है | इन्ही तत्वों से राजनीति और समाज नीति बनी है | इन्ही बातों से भारत का परिवार चलता है न कि राजनीति परिवार चलाती है | मनुष्य यदि देवता कि तरह हो जाएँ और समाज हित में कार्य करें तो ये विकास हुए लेकिन यदि सिर्फ अपने लिए करें किसी का भला न करें और फिर ऊपर से मौका मिले तो नष्ट कर दें, तो ये तो विकास नहीं माना जायेगा | ये तो विकृति ही कही जाएगी |
दरअसल विकास की जो पश्चिमी सोच है वो शोषणमूलक, विषमतामूलक, अमानवीय और अप्राकृतिक है | मानव की सुविधाओं के लिए अधिक से अधिक उत्पादन और फिर उसका उपभोग ही विकास माना जाने लगा | भारत के "संतोष ही परम सुख है" की बात को भ्रान्ति बताया और प्रचारित किया गया | करोड़ों वर्षों के भारत के रहन सहन और विचार व्यवहार के तरीकों को गलत सिद्ध करने की होड़ मच गयी | अपने ही जीवन के प्रति नफरत का भाव पैदा करने के षड्यंत्र में देश की चुनी हुई सरकारों ने भी पूरा साथ दिया | ऐसा क्यों है ? हर बात के पीछे कोई न कोई कारण होता है | इन सब बातों की रचना पॉलिटिक्स और इकोनोमिक्स की तरफ बढ़ी, तबाही की तरफ बढ़ी | अन्यों के विनाश के तरफ बढ़ी | मानवता और प्रकृति के विनाश की तरफ बढ़ी | हिरोशिमा में गिराया गया ऐटम बम इसी विकास का परिचायक है | बड़ा विकासहुए तो अब थोक में मरने वालों की संख्या भी बढ़ गयी | ए.के 47 और ए.के. 56 का भी आविष्कार हुवा | ये भी बड़ा विकास है | इन बातों का अर्थ है की जितनी तेज मौत और जितनी संख्या में मौत उतना बड़ा विकास | तो मानव जाति के समाप्ति पर बढ़ता कदम ही आज का विकास है | ये सब मानवीय संवेदनाओं के अभाव में ही संभव हुवा है | इसलिए जीव जगत के साथ साथ जगदीश के तत्व को नकारना इस सारी समस्या का मूल कारण है | प्रकृति से ऊपर होने का यह अर्थ नहीं है कि सब कुछ दुनिया में सिर्फ मनुष्य के लिए ही बना या बनी है | मनुष्य इस प्रकृति का नियंता नहीं है | जितना इस प्रकृति से ले उससे ज्यादा देने कि जिम्मेदारी है मनुष्य की | मनुष्य ने धरती नहीं बनायी है | न ही ये पहाड़, ये जंगल, ये नदी, ये झरने | ये सब प्राकृतिक हैं | तो फिर सारी सृष्टि ही मनुष्य के लिए ऐशगाह है ऐसा विचार ही अप्राकृतिक है | अपनी सुविधा के लिए जंगल ख़त्म हो जाएँ, नदियां मोड़, काट दी जाएँ, पक्षियों का कोई स्थान ही न बचे, उनके वंश समाप्त हो जाएँ, क्या हर्ज है ? ऐसी मानसिकता ही अप्राकृतिक है | ऐसे में सृष्टि से परस्परानुकूलता का भाव ही समाप्त हो जायेगा | इसलिए संतुलन की आवश्यकता है | यही भारतीय जीवन शैली है इसीलिए कहा गया है कि "साईं इतना दीजिये जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाये" | कितना शुद्ध और महान दर्शन है भारतीय संस्कृति का, समता का, बराबरी का | भारत में यदि गौ को माता कहा जाता है तो सर्वगुण सम्पन्नता के कारण | भारत में तो घर कि माता, धरती माता और गौ माता का ही चक्र है | यही दैवी चक्र तो घर-घर में पूज्य है | इसीलिए हर एक का स्थान है प्रकृति में, ये भाव नहीं रहा तो कैसा विकास ?
समृद्धि जबतक संस्कृति कि सेज में नहीं आएगी तब तक समृद्धि नहीं मानी जाएगी | प्रकृति में हर एक का अपना बराबर हक़ और हिस्सा है | कोई किसी का हक़ न छीने, सभी को जीने का समान अधिकार है इसीलिए अब जियो और जीने दो कि जगह हमारा नारा होना चाहिए कि "जीने दो तब जियो" यदि संस्कृति आधारित भारत का विकास हुए तो हम गर्व से कह सकेंगे कि हमने पुनः राम-राज्य प्राप्त कर लिया है | इसलिए स्वाभिमान पार्टी मानव केंद्रित विकास कि अवधारणा को नकारते हुए भारतीय संस्कृति आधारित विकास कि परिकल्पना के आधार पर "प्रकृति केंद्रित विकास" को स्वीकार करती है |


















