2) चुनौतियाँ : व्यवस्था के तहत समझना होगा की लोकतंत्र का जन्म प्रतिक्रिया स्वरुप हुवा है | राज्य की स्थापना के सम्बन्ध में परिभाषित किया गया था कि state is to protect those who can not protect themselves. जब दुनिया में समाजवाद और पूंजीवाद असफल सिद्ध हो चुका तब कम्युनिज्म का भी उदय हुवा | यदि भारत के ईमानदार और स्पष्ट दृष्टिकोण से समझा जाये तो कम्युनिज़्म एक सफ़ेद झूठ के आधार पर टिका है | रूस में ऐसे सिद्धांत पूर्णतः असफल सिद्ध हो चुके हैं | प्रारम्भ से अब तक हमारी सोच रही है कि " सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद् दुःखभाग्भवेत | " भारतीय समाज धर्म पर आधारित समाज है | यहाँ पंथों और मजहबों को भी मान्यता है किन्तु वे धर्म के समक्ष नतमस्तक होते हैं | इसीलिए यह ज्ञातव्य है कि " न राज्यम न च राजाssसीत् न दण्डयो न च दाण्डिकः | धर्मेणैव प्रजास्सर्वाह रक्षन्तिस्म परस्परं |" अर्थात न तो राज्य था न राजा, न ही दंडनीय अपराधी, न ही दंड | धर्म के द्वारा ही सम्पूर्ण प्रजा एक दुसरे की रक्षा करती थी | अतः धर्म का राज्य होना चाहिए | धर्म के सन्दर्भ में स्पष्ट रूप से अंतर समझते हुवे यह भी कहा गया है कि " आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्य मेतत्पशुभिर्नराणाम् | धर्मोहि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ||" अर्थात आहार, निद्रा, भय, मैथुन, के गुण पशुवों और मनुष्यों में सामान हैं | मनुष्यों में धर्म ही विशेष है | बिना धर्म के मनुष्य भी पशुवों के सामान ही है | भारतीय संस्कृति सिर्फ भारत के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिए विरासत है | हमारी संस्कृति को अरण्य संस्कृति माना गया है | इसी लिए सारी दुनिया की सभ्यता और संस्कृतियों के समाप्त हो जाने, ह्रास होने के बावजूद हमारी संस्कृति अक्षुण्य है | यही हमारी विरासत है | स्वतंत्रता प्राप्ति के छह दशक बाद भी हम अपने ही देश में अपनी पह्चान ढूंढ रहे हैं | अपनी अक्षय विरासत के बावजूद हम अपना मूल्यांकन पश्चिमी देशों के मानदंडों के अनुसार कर रहे हैं | हर दृष्टि से पूर्ण होने के बावजूद भारत को पिछड़े देशों की श्रेणी में रखकर बाज़ारवादी व्यवस्था के तहत भारत को ही लूटने का षड्यंत्र चल रहा है | भारत के स्थापित राजनैतिक दलों का मूल उद्देश्य सत्ता और पैसा कमाना ही रह गया है चाहे उसकी कोई भी कीमत देनी पड़े | भारत में जीडीपी और ग्रोथ रेट अर्थ हीन हैं | भारत की व्यवस्था में शेयर बाजार भी महत्वपूर्ण नहीं है | फिर भी जानबूझकर समाज को इसी तरफ प्रेरित किया जा रहा है | यही आज की महत्वपूर्ण चुनौती है |
3) पार्टी का दृष्टिकोण : जीवन का महत्त्व है | पद्धतियाँ बदलती रहती हैं | जीवन के लिए लक्ष्य श्रेष्ठता प्राप्त करना और विकास की नई ऊंचाइयों तक पहुंचना है | किन्तु विकास का अर्थ प्रकृति के साथ संतुलन और सहयोग सहित है | पर्यावरण का नुकसान कर विकास की अंधी दौड़ भारत की तासीर से मेल नहीं खाता है | इसलिए आज भारत परस्त और गरीब परस्त नीति की आवश्यकता है | इस विचारधारा के अंदर भारत के गाँवों को उनकी पूर्व प्रकृति के अनुरूप स्वावलम्बी और अधिकारयुक्त करना आवश्यक है | ग्रामसभाओं को ही देश की संसद की तरह कार्य करने की सक्षमता प्रदान करना होगा | पंचायतों को सामर्थ्यशाली बनाना होगा | भारत कृषि प्रधान समाज है | कृषि गौ वंश आधारित होनी चाहिए | भारत में धरती माता, घर की माता और गौ माता को ही देवी त्रिकोण माना गया है | यही शक्ति का प्रतीक है | अतः भारत जीव, जगत के साथ ही जगदीश्वर के तत्व को और उनके अन्तर्सम्बन्धों को स्वीकार करता है | कुरीतियां श्रेष्ठ मानव समाज के लिए घातक हैं अतः इनका निवारण पांथिक गुरुवों और इसी प्रकार के संगठनो का दायित्व भी है | एकीकृत शिक्षा व्यवस्था और भूमिसुधार की आवश्यकता है | भारत परस्त नीति का एक प्रमुख दृष्टिकोण यह भी होगा कि हमारी संकल्पना अखंड भारत की है | ऐसा संभव होने से ही भारत के औपनिवेशिक काल की कड़वाहट समाप्त होगी | और भारत एक गौरवशाली राष्ट्र के रूप में विश्व में स्थान पा सकेगा | भारतीय समाज प्रगतिशील समाज है | हर पंथ और मजहब का सम्मान करना भारत की संस्कृति रही है | किन्तु भारतीयों का भारत के बाहर के अन्य मतों, पंथों में परिवर्तन किया जाना भारतीयता का विरोध है | अतः भारतीय भूभाग में भारतीय संस्कृति से जुड़े लोगों का पंथ परिवर्तन राष्ट्र की मूल भावना के विपरीत है | हमारा मूल मन्त्र है कि " सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःखभाग्भवेत ||" अतः सबके लिए सामान सोच रख कर कानून व्यवस्था और नीति का निर्धारण आवश्यक है | किसी भी एक वर्ग को खुश रखने के लिए नीतियां बनाकर उनका समर्थन मात्र तुष्टीकरण है | सेवा की सच्ची भावना ही धर्म है | वैभव की हमारी कल्पना का आधार भारतीय संस्कृति और सभ्यता के आधार पर स्थापित है | गरीब परस्त नीति का अर्थ है कि ऐसी नीति तैयार करना, जिससे स्वाभाविक तौर पर समाज के अंतिम पायदान पर बसर करने वाले व्यक्ति को लाभ मिल सके | इसलिए मूलभूत आवश्यकताओं पर सबका सामान अधिकार मानते हुवे नीति तैयार करना ही गरीब परस्त एजेंडा होगा | इस नीति के तहत प्रति व्यक्ति आय अथवा गरीबी रेखा आदि का पैमाना नहीं होगा | बल्कि कौन कितना प्रसन्न है या कहें कि हर व्यक्ति कि प्रसन्नता ही हमारे गरीब परस्त नीति का पैमाना होगा | इसके लिए सबको संतुलित आहार मिले यह तंय करना भी प्रमुख होगा | श्रम का महत्व कृषि-प्रधान भारतीय संस्कृति के अनुकूल है। व्यव्हार में इसी प्रकार के राजनीती की आवश्यकता है | शक्ति ही जीवन का आधार है अतः राष्ट्र के पुरुषत्व को जगाना होगा | दुर्बलता ही मृत्यु है अतः युवाओं को कौशल और नीति परक समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए | चरित्र सर्वज्ञ है अतः भारतीय संस्कृति के महानतम लोगों के आदर्श स्थापित करने का प्रयास होना चाहिए | राजनीति और सेवा के कार्य में हमारे साथ के लोगों का जीवन अग्नि की तरह होना चाहिए जिससे कि समाज के समक्ष अच्छा उदाहरण स्थापित हो सके | इन बातों के अनुरूप राष्ट्र निर्माण के लिए लक्ष्य प्राप्ति हेतु सामान्य बुद्धि लेकिन सुदृढ़ व्यक्तित्व के लोग जिनमे श्रद्धा और निर्भीकता का भाव हो, स्थान प्राप्त कर सकेंगे |
4) हमारा कार्य और लक्ष्य : राजनीति आज स्वहित साधने का साधन मात्र रह गयी है | आदर्श, मूल्य और सेवा का स्थान गौण हो गया है | परिवार के सदस्यों को रोजगार के तौर पर पदस्थापित करना, कई प्रकार के लाभ अर्जित करने मात्र के लिए यह साधन भर है | ऐसे में लोकतंत्र का अस्तित्व ही दांव पर है | हम ऐसे अविश्वसनीय माहौल में वैकल्पिक राजनीति के माध्यम से नया राजनैतिक विकल्प देने को तैयार हैं | हमारा यह दावा नहीं है कि हम सारी व्यवस्था को एक ही झटके में बदल देंगे या ठीक कर देंगे अपितु राजनीति को मुद्दों, मूल्यों और विचारों की राह पर लाने का प्रयत्न करेंगे | हमारा विचार है कि सभी हमारे अपने हैं और हम भी सभी के हैं इसलिए सैद्धांतिक, वैचारिक या राजनैतिक मतभेद हमारे व्यक्तिगत मतभेद नहीं हैं | हम मानते हैं कि सभी के पास सत्य का कुछ टुकड़ा है | हम अपने आधार पर सबको अपना मानकर कार्य करने को तत्पर रहेंगे | ऐसा होना राजनैतिक कार्यकर्ताओं के आचरण से ही संभव है | इसलिए हमारा प्रयास आरम्भ से ही पूर्ण स्पष्टता के साथ कार्य करना रहेगा | हमारे दल के कार्यकर्त्ता सामान्यतः किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ की राजनीति से परहेज करेंगे | साथ ही आमरण अनशन की राजनीति को हम संवैधानिक और भयादोहन की राजनीति मानते हुवे इसका विरोध करेंगे | राजनीति में हमारा विरोध तात्विक होगा | हम हर बात का मात्र इस कारण विरोध नहीं करेंगे क्योंकि हम विपक्ष में हैं अथवा हम विरोधी हैं, या हम सत्ता पक्ष हैं तो विरोध ही अनसुना कर देंगे | अपितु सरकार के अच्छे प्रयास का हम सार्वजनिक रूप से समर्थन भी करेंगे | अतः हम गंभीर लेकिन मर्यादित विरोध भी करेंगे साथ ही तात्विक समर्थन भी करेंगे | यदि हमारे दल को सरकार बनाने के लिए जनसमर्थन मिलता है तो हम एक निश्चित आचरण संहिता का पालन करेंगे | तदनुरूप विपक्ष से भी वैसी ही अपेक्षा रखेंगे | हमारा मत है कि संविधान को राष्ट्र के लोगों के भावनाओं के अनुकूल बनाना आवश्यक है | नीति निर्देशक तत्वों की समीक्षा की आवश्यकता है | देश में सस्ता और सुलभ न्याय जन सामान्य को मिल सके ऐसी नीति कि आवश्यकता है | इसके लिए ग्राम न्यायालयों की शुरुवात हो | चुनाव की प्रक्रिया में आवश्यक बदलाव हो | चुनाव आयोग को मजबूत किया जाये | अंग्रेजों की जटिल नौकरशाही से निजात दिलाना भी आवश्यक है | ऐसे ही जन प्रतिनिधित्व अधिनियम को भी कारगर बनाना जरूरी है |योगक्षेम हमारा लक्ष्य है |सत्ता पर अंकुश भी अनिवार्य है |
5) राष्ट्र एवं हमारा दृष्टिकोण: धर्म की मूल परिभाषा के अनुसार धर्म वह है जो न्याय और सत्य है बाकी सब अधर्म है।
विज्ञान अर्थात सब पदार्थों को यथार्थ जानना | धर्म कभी भी विज्ञान विरोधी नहीं है अपितु उससे ही विज्ञान निकला है
ऐसा हमारा मानना है | हम इस सम्पूर्ण भूभाग को जिसे भारत कहते हैं, माता के रूप में स्वीकारते हैं उसी तरह सपूर्ण
धरती भी हमारी माँ है, ऐसा हमारा मत है | भारत की नदियों, पर्वत मालाओं, जड़ी बूटियों, वेद, और शांत निर्मल जीवन
आधारित राष्ट्र का निर्माण आवश्यक है | राजनीतिक सीमाओं का भी निर्धारण आवश्यक है | इस हेतु राष्ट्रीय इक्षा शक्ति
आवश्यक है |राष्ट्र एक भावात्मक बोध है | सब में स्वयं का ही दर्शन करना और स्वयं के लिए नहीं बल्कि दूसरों के लिए
जीवन जीना हमारी संस्कृति है | इस बोध के तहत सिर्फ पालन पोषण का नहीं बल्कि संस्कृति का भी महत्त्व है | अंग्रेजों की
बनाई गयी शिक्षा प्रणाली के स्थान पर वास्तविक इतिहास की जानकारी और पौरुष युक्त जीवन का निर्माण करने वाली
शिक्षा व्यवस्था ही मुख्य ध्येय होगा | हमें समाज में पंथ निरपेक्षता और धर्म निरपेक्षता का ज्ञान करना आवश्यक है | साथ
ही यह भी जीवित सत्य है कि जब निष्ठाएँ समाप्त हो जाती हैं तब कम्युनिज़्म का उदय होता है | अतः ऐसे संकटों से समाज
को सुरक्षित रखना भी दायित्व है | हमारे कार्यकर्त्ता इस प्रकार कार्य करेंगे कि समाज के प्रति हमारा ऋण स्पष्ट हो | सेवा
करने की शैली का विकास किया जाना आवश्यक है | सामाजिक कुरीतियों को पहचान कर उससे दुराव के उपाय करना,
यदि किसी प्रकार का विदेशी षड्यंत्र हो तो उससे आगाह करना आवश्यक है | हम वास्तविक राजनीति पर भरोसा रखते हैं
जिसके तहत समाज को शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न किया जाना आवश्यक है | दरअसल घोषणाएं बदलती हैं वास्तविकता
नहीं बदलती, इस उक्ति को हराना ही उद्देश्य होगा | शांति और स्वातंत्र्य के लिए शक्ति आवश्यक है | लेकिन संसार सिर्फ
शक्ति के आगे झुकता है अहिंसा के आगे नहीं, यह भी कपोल कल्पना है | अतः विश्व के ऐतिहासिक सत्य को संकलित करना
और वास्तविक स्थिति के आधार पर अपनी नीति बनाना आवश्यक होगा | वैश्विक औद्योगिक क्रांति जिसके फलस्वरूप
शक्ति प्राप्त होने पर राज्यों को हड़पा गया, स्पेन का अमेरिका पर आक्रमण, पुर्तगाल, हूँड आदि का आक्रांता होना और आगे
अंग्रेजों की विस्तारवादी नीतियां, वर्त्तमान कि वैश्विक नीति के आधार पर भारत की समझ और आवश्यकता के आधार पर
नीति निर्धारण आज की चुनौती है | फिर भारत को विश्व गुरु बनाना ही वैश्विक लक्ष्य है | स्वदेशी के प्रति उत्साह और
आदर का भाव जागृत हो ऐसा प्रयास आवश्यक है | विश्व की सारी शक्तियों का निशाना अब भारत ही है यह समझना और
इसके तहत नीतियां बनाकर कार्य करना चुनौती है | स्वदेशी का अर्थ है "आर्थिक राष्ट्रवाद" | स्वदेशी के सन्दर्भ में हमारे
आदर्श स्वरुप लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था " स्वदेशी अपनी सर्वश्रेष्ठ अवस्था में अपनी मातृभूमि के प्रति गहरा
और जोशीला प्रेम या अनुराग है | यह प्रेम मातृभूमि के किसी एक पक्ष के उत्थान हेतु कार्य करने के अवसर नहीं खोजता
बल्कि सभी पक्षों पर स्वयं को कार्यशील बनाये रखता है | यह व्यक्ति को पूरी तरह अपने आगोश में ले लेता है और तब तक
चैन की सांस नहीं लेने देता जब तक व्यक्ति का सम्पूर्ण विकास हो जाये |” इसी बात को प्रेरणा मानकर स्वदेशी को
युगानुकूल बनाकर भारतीय अर्थशास्त्र की पुनर्रचना की आवश्यकता है |इस हेतु विकेंद्रीकरण की नीति तैयार करके उस
अनुरूप कार्य करना ही प्रमुख होगा | स्वदेशी नीति के तहत विश्व व्यापार संगठन के समक्ष भारत की महत्वपूर्ण मांगों को
रखना और नीति तैयार करवाना भी प्रमुख विषय है| एक नवीन स्वदेशी परिकल्पना के तहत "अपने सपनो का भारत"
तैयार करने के लिए स्वदेशी नीति कि आवश्यकता होगी | तदनुरूप भारत में कृषि और किसानो के लिए नयी नीति तैयार
किया जाना आवश्यक है | जमीन और पानी के श्रोतों का सुदृढ़ीकरण भी आवश्यक है | इस हेतु नीति बनाकर काम करना
होगा | सामाजिक विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और निवास की नयी नीति तैयार करनी होगी | महिलाओं का ध्यान
रखते हुवे उनकी गरिमा और अधिकारों के अनुरूप नीति तैयार करना आवश्यक है | देश की विधायिका, न्यायपालिका और
कार्यपालिका में भी गरिमामय स्वरुप में उनका स्थान सुनिश्चित करना आवश्यक है | समय के साथ साथ महिलाओं के लिए
कई प्रकार की चुनौतियाँ सामने आती जा रही हैं | अतः अपनी भारतीयता के अनुरूप महिलाओं के लिए विशेष नीति बनाये
जाने की आवश्यकता है | ज्ञान पूर्वक विरोध और वाणी व्यव्हार की आवश्यकता है | प्रयत्न ही परमेश्वर है अतः " चरैवेति
चरैवेति प्राचलमह निरन्तरं " ही हमारा ध्येय सूत्र होगा |
6) हमारी विदेश नीति के कुछ पक्ष : भारत हमेशा से शांतिप्रिय राष्ट्र रहा है | सदैव अतिथि देवो भव के आधार को चरितार्थ
करता रहा है | किन्तु राष्ट्र की एकता अखंडता, सुरक्षा, और हमारी संस्कृति के साथ किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक स्थिति
में कठोर और समुचित निर्णय लिया जाना आवश्यक है | पड़ोस के देशों में पाकिस्तान की उत्पत्ति का आधार मजहबी नफरत
था | इसलिए मुस्लिम आबादी के लिए पाकिस्तान का निर्माण हुवा | भारत और श्रीलंका सदैव एक दुसरे के मित्र राष्ट्र रहे हैं
अतः स्वाभाविक पड़ोसी होने के कारण संबंधों में बराबरी का रिश्ता हर दृष्टि से महत्वपूर्ण है | भारत नेपाल और भूटान से
सांस्कृतिक रूप से सामान धरातल पर है अतः दोनों राष्ट्रों के साथ हमारा रिश्ता सगे भाइयों की तरह आदिकाल से चला आ
रहा है | चीन और भारत में जवाहरलाल नेहरू के कालखण्ड में हुवे युद्ध को छोड़ दिया जाये तो कभी भी चीन भारत के
लिए घातक नहीं रहा था | किन्तु माओत्सेतुंग का युद्धक विचार था और स्वभाव से चीनी व्यक्ति मानवोचित व्यव्हार नहीं
कर पाते | वे मानव को छोड़ धरती की हर चीज़ को भक्छ्य मानते हैं | चीन में स्वाभाविक लोकतंत्र नहीं है और उसकी
वृत्ति भी विस्तारवादी है | तदनुरूप हमें "जैसे को तैसा " मानकर अपनी नीति का निर्धारण करना होगा | घातनीति से
सावधानी आवश्यक है | अंतर्राष्ट्रीय गहरी चालों को समझकर सम्बन्ध बनाना महत्वपूर्ण है | देश के अंदर जो संघर्ष चल रहे
हैं हम उन्हें अपनी आपसी नासमझी मान कर हर विवाद का समाधान देशी तौर तरीकों से करने में समर्थ हैं | हमारा मानना
है की हर बात का बातचीत से हल संभव है | हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने सही मित्रों की पह्चान करना आवश्यक है |
सही मित्रों से प्रगाढ़ता विश्व में भारत के विश्वगुरू का मार्ग भी प्रशश्त करेगी साथ ही सम्पूर्ण विश्व में शांति स्थापना के
लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा | किसी भी सरकार कि नीति गीता या कुरान से नहीं बनती जिसे बदला नहीं जा
सकता, समय के हिसाब से इसे जरूर बदला जाना चाहिए | हमारे पड़ोसी अलग अलग हैं उनका व्यवहार हमारे प्रति अलग
अलग है तो हमे नीति भी उनके हिसाब से बनानी चाहिए | किसी शक्तिशाली देश की जरूरत के हिसाब से अथवा दबाव में
नीतियों का निर्माण नहीं किया जा सकता | देश की गुप्तचर संस्थाओं को मजबूत बनाने की जरूरत है | भारतीय सेना विश्व
के सर्वोत्कृष्ट सेना है अतः इसकी गुणवत्ता,व्यवस्था आदि के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता | सदैव इस उक्ति का
हम समर्थन करेंगे क़ि सर्वप्रथम व्यक्ति है उससे महत्वपूर्ण संगठन और समाज है | किन्तु सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्र है |
7) राजनैतिक आवश्यकताएं : यदि आज क़ि राजनीती को समझा जाये तो भारतीय राजनीती का वीभत्स स्वरुप दिखाई देता
है | राजनैतिक मतों की दूरी एक दूसरे को दुश्मन मान कर कार्य करने के लिए उकसा रही है | हर प्रकार की चरित्रहीनता
राजनीति में है जिससे आम भारतीय का विश्वास राजनीती से उठ रहा है | नैतिकता का अभाव है | कार्यकर्ता का शोषण
और ढोंग की राजनीति केवल तुष्टीकरण को बढ़ावा दे रही है | जीवंत आदर्श समाप्त से हो रहे हैं | प्रेरणादायी कल्पनायें भी
स्वप्नदृष्टाओं के द्वारा नहीं मिल रही हैं | राष्ट्रीयता का बेहद अभाव है | धर्म का सीधा अर्थ मजहब या पंथ हो गया है और
गिरावट निचले स्तर से उच्च स्तर तक दिखाई दे रही है | आचरण भृष्ट है | अतः समाज के सामने सेवा के उन्ही मूल्यों और
आदर्शों की पुनर्स्थापना जरूरी है जिनकी समाज राजनीतिज्ञों से अपेक्षा करता है | वास्तविकता का सामना करने की
आवश्यकता है ना कि पीठ दिखने से काम चलेगा | सामर्थ्य से सारी समस्याओं का समाधान होगा | इसके लिए एक निश्चित
मर्यादा का पालन करते हुवे राजनीति में कार्य करने की आवश्यकता है | अतः समाज की जड़ों का पोषण अपनी नीतियों
द्वारा कार्यकर्ताओं के आधार पर करना आज की सबसे बड़ी राजनैतिक आवश्यकता है |
8) हमारा आह्वान : जैसा की नाम से ही विदित है " स्वाभिमान " | किसी भी जीवंत राष्ट्र का यह प्राण है | बिना स्वाभिमान
के राष्ट्र की कल्पना भी असंभव है | हमारे हर राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट हैं | पार्टी के माध्यम से देश की सेवा में लगे लोगों को
पूर्ण और वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त है | सिर्फ विचार नहीं बल्कि कर्म और विचार दोनों के मेल से जो व्यक्ति कार्य करेंगे
उनका स्वागत और सत्कार हमारा दायित्व है | चुनौतियों का सामना करने का हमारा आधार स्वावलम्बन है | हम
स्वावलम्बियों के निर्माण और सम्मान के लिए प्रयत्नशील रहेंगे | धन का सम्मोहन राजनीति में आत्मघाती साबित होता है
अतः इसके लिए सामान्य आचरण संहिता के अनुरूप कार्य करना आवश्यक है | हमारा मानना है क़ि हर व्यक्ति में एक
वैज्ञानिक छुपा हुवा है | सिर्फ सही वक्त पर उसे पह्चान की जरूरत है | अतः राष्ट्र निर्माण में हर व्यक्ति हर इकाई समान
और बेहद महत्वपूर्ण है | हर व्यक्ति जो भारतीय नागरिक है वह हमारे लिए हमारी संपत्ति है | और हर व्यक्ति के सम्मान के
साथ ही राष्ट्र का सम्मान जुड़ा है | अतः आज समय की आवश्यकता को देखते हुवे भारत को पुनः गौरवशाली स्थान दिलाने
में आप सबकी भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी | इसी आशा और विश्वास के साथ समाज की सज्जन शक्ति, युवा शक्ति, मातृ शक्ति
और सभी राष्ट्र भक्तों से ये आव्हान है कि देश हित में कार्य करने के संकल्प से कार्य कर रहे इस राजनीतिक प्रकल्प
"स्वाभिमान पार्टी" का तन मन और धन से सहयोग करें | आपका सहयोग और साथ ही हमारा सम्बल है |


















